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जब तक दर्शन तब तक वही प्रधान... 50 साल कायम रही मुलायम की जुबान, सैफई की दास्तां

उवैश चौधरी, इटावा इंदिरा गांधी की आंधी हो या मोदी युग का आगाज। यूपी के इस इलाके में वक्त बदला, सरकारें बदलीं लेकिन नहीं बदली तो प्रधान की कुर्सी। इस कुर्सी पर 50 साल तक एक ही शख्स का दबदबा कायम रहा। हम बात कर रहे हैं सैफई की। जी हां, वही सैफई जो समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव के पुश्तैनी गांव के रूप में मशहूर है। यूपी में पंचायत चुनाव की तैयारियों में पार्टियां जुटी हैं। आइए जानते हैं 'नेताजी' के गांव की प्रधानी की कहानी... 1971 में प्रधान बने दर्शन सिंह, इस बार आरक्षित सीट उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई की सीट 50 साल के बाद आरक्षित हो गई है। यहां इस बार एससी वर्ग का प्रधान चुना जाएगा। सैफई गांव में 1971 से दर्शन सिंह यादव ही लगातार प्रधान पद की कुर्सी पर काबिज रहे। सूबे में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर इटावा में आरक्षण लिस्ट दो दिन पहले जारी हुई है। एसपी के गढ़ माने जाने वाले इटावा में इस बार नई आरक्षण व्यवस्था से कई सीटों का समीकरण बिगड़ गया है। यहां दशकों से काबिज चले आ रहे लोगों का खेल बिगड़ गया है। 1971 से अब तक इतने लंबे समय तक किसी ग्राम पंचायत का प्रधान रहने का यह देश में अनोखा मामला है। 'कृष्ण-सुदामा' की जोड़ी के रूप में चर्चित मुलायम सिंह यादव के गांव सैफई के विकास में प्रधान दर्शन सिंह का खासा योगदान माना जाता है। एक साल पहले 17 अक्टूबर को दर्शन सिंह यादव का निधन हो गया था। सैफई के लोग दर्शन सिंह के निधन के बाद कहने लगे कि अब कृष्ण-सुदामा की जोड़ी टूट गई है। इटावा जिले के सैफई गांव की तस्वीर बदलने के पीछे ग्राम प्रधान दर्शन सिंह यादव का खास योगदान माना जाता रहा है। 'जब तक दर्शन सिंह तब तक कोई प्रधान नहीं बनेगा' दर्शन सिंह यादव कम शिक्षित होने के बावजूद सरकारी बाबुओं पर कड़ी नजर रखते थे और गांव के विकास के लिए आए पैसे का हिसाब उनसे लेते थे। जानकारों की मानें तो मुलायम सिंह यादव ने कह दिया था कि जब तक दर्शन सिंह हैं, तब तक कोई दूसरा प्रधान सैफई में नहीं होगा और हुआ भी कुछ ऐसा ही। मुलायम ने अपनी जुबान और दोस्ती निभाते हुए सैफई में किसी और को प्रधान नहीं होने दिया। जब तक दर्शन सिंह जिंदा रहे वही सैफई के प्रधान बने रहे। दर्शन सिंह और एसपी सरंक्षक मुलायम सिंह बचपन के मित्र थे। जेल गए मुलायम तो आमरण अनशन करने पहुंच गए दर्शन सिंह मुलायम सिंह ने जब राजनीति में कदम रखा तो उनके कंधे से कंधा मिलाकर दर्शन सिंह चले। लोहिया आंदोलन के दौरान 15-16 साल की उम्र में मुलायम सिंह सियासत में कूद पड़े। इसी दौरान पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। उन्हें फर्रुखाबाद जेल में बंद कर दिया था। इसकी भनक जैसे ही दर्शन को मिली तो वह जेल के बाहर आमरण अनशन पर बैठ गए। इसके चलते जिला प्रशासन को मुलायम सिंह को रिहा करना पड़ा। पहलवानी का शौक, मुलायम के साथ साइकिल पर करते थे प्रचार मुलायम सिंह की ही तरह दर्शन सिंह को भी बचपन से ही पहलवानी का बड़ा शौक था। 1967 के चुनाव में दर्शन सिंह मुलायम सिंह के साथ साइकिल पर चुनाव प्रचार करते थे और घूम-घूमकर चुनाव में मेहनत करते थे। 1971 में सैफई के पहली बार प्रधान चुने गए दर्शन सिंह प्रधानी के चुनाव नियमित समय पर न होने के चलते 1971 के बाद 1982,1988 और 1995 में चुनाव जीतकर निर्वाचित हुए। वहीं 1995 से पांच वर्ष के नियमित अंतराल पर चुनाव कराए जा रहे हैं। तभी से दर्शन सिंह को ही ग्राम प्रधान चुना जाता रहा। 17 अक्टूबर 2020 को निधन के बाद बहू को मिली जिम्मेदारी पिछले साल 17 अक्टूबर को दर्शन सिंह का बीमारी के चलते निधन हो गया। उसके बाद उनकी बहू मीना को प्रधान की जिम्मेदारी सौंप दी गई, लेकिन अब नई आरक्षण व्यवस्था के चलते सैफई गांव में प्रधानी सीट किसी दलित के हिस्से में जाएगी। एसपी मुखिया और पूर्व सीएम अखिलेश यादव की सरकार में दर्शन सिंह को यश भारती पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गई। इसके बाद दर्शन सिंह यादव लाइम लाइट में आए थे और पूरे सूबे में उनकी चर्चा होने लगी।


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