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माफिया मुख्तार पर योगी और कैप्टन की सरकार में क्यों तकरार? जानें पूरी कहानी

लखनऊ यूपी के माफिया मुख्तार अंसारी इन दिनों यूपी और पंजाब की सरकारों के बीच 'हॉट टाक' का सबब बने हुए हैं। मुख्तार अंसारी को लेकर दोनों राज्य सरकारों की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। कोर्ट में दोनों सरकारों की ओर से नामचीन वकील खड़े हो रहे हैं। यूपी को मुख्तार अंसारी चाहिए लेकिन पंजाब मुख्तार अंसारी को देने को तैयार नहीं है। दोनों सरकारों के वकील हर पेशी पर अपने तर्कों के तीर चला रहे हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाया है। एक माफिया दो सरकारों के लिए क्यों नाक की लड़ाई बन गया है, यह जानना दिलचस्प है। लेकिन, उससे भी ज्यादा दिलचस्प यह जानना होगा कि इस लड़ाई की नौबत कैसे आई? क्या है पूरा मामला मुख्तार अंसारी के खिलाफ यूपी में गंभीर प्रकृति के कई सारे मामले विचाराधीन हैं। लेकिन, उनके पंजाब जेल पहुंचने की कहानी कम दिलचस्प नहीं है। 2019 में मुख्तार अंसारी के खिलाफ एक मामला पंजाब में दर्ज हुआ। वहां के एक बड़े बिल्डर ने मुख्तार अंसारी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई कि मुख्तार फोन के जरिए उनसे रंगदारी मांग रहे हैं। पंजाब की पुलिस यूपी आई और अपने यहां दर्ज एफआईआर के आधार पर मुख्तार अंसारी को लेकर पंजाब चली गई। शिकंजा नहीं कसा, पंजाब जेल में ऐश करने का आरोप शुरुआत में तो माना गया कि मुख्तार पर शिकंजा कस रहा है। यूपी के बाहर भी उसके खिलाफ केस दर्ज होना शुरू हो गए हैं। लेकिन बाद में यह अहसास हुआ कि यूपी के साथ दांव हो गया। बहुत ही खूबसूरती के साथ मुख्तार यूपी से बाहर हो गए। मुख्तार के पंजाब की जेल में ऐश-ओ-आराम के साथ रहने की खबरें जब मीडिया के जरिए आना शुरू हुईं तो यूपी ने पंजाब से अपने यहां दर्ज केसों के सिलसिले में मुख्तार अंसारी को वापस करने की मांग करना शुरू की। लेकिन पंजाब सरकार किसी न किसी तर्क के आधार पर वापसी को तैयार नहीं हुई। अपने स्तर पर बात न बनते देख यूपी सरकार को सुप्रीम कोर्ट की शरण लेनी पड़ी तो पंजाब सरकार भी नामचीन वकीलों के साथ सुप्रीम कोर्ट आ खड़ी हुई है। यूपी के लिए क्यों नाक का सवाल बना? विचाराधीन मामलों के लिए मुख्तार को यूपी लाना कानूनी जरूरत तो है ही लेकिन राजनीतिक जरूरत भी है। मुख्यमंत्री बनने के बाद से योगी आदित्यनाथ राज्य में माफियाओं के खिलाफ बड़ा अभियान चलाए हुए हैं। उनकी कोशिश एक ऐसी छवि गढ़ने की है, जहां माफिया के साथ कोई नरमी नहीं। लेकिन, जिस तरह से यूपी के एक माफिया की पंजाब से ऐश-ओ-आराम वाली खबरें आ रही हैं, वह उन्हें चिढ़ाने वाली लगती हैं। मुख्तार अंसारी का पूर्वी यूपी की एक खास जाति के साथ 36 का आंकड़ा माना जाता है। मुख्तार पर नकेल कसकर उस जाति को भी संदेश देना जरूरी है कि हमने उस माफिया को 'आजाद' नहीं घूमने दिया। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से पहले से भी पूर्वी यूपी में राजनीतिक दबदबे को लेकर योगी आदित्यनाथ की हिन्दु युवा वाहिनी और मुख्तार की 'सेना' के पाले बंटे रहे हैं। यूपी में अगले साल विधानसभा चुनाव इसलिए.... मुख्तार अंसारी 1996 से लगातार विधायक हो रहे हैं। इस दरम्यान वह निर्दलीय भी जीते हैं, अपनी पार्टी बनाकर भी। इस वक्त वह बीएसपी के साथ हैं। उनके भाई अफजाल अंसारी भी सांसद हैं। एक और भाई भी विधायक रह चुके हैं और अब उनके बेटे भी राजनीति में पांव पसार रहे हैं। यूपी में विधानसभा के चुनाव के अब एक साल ही बचे हैं, उसकी तैयारियों के मददेनजर सियासी समीकरणों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। योगी आदित्यनाथ के पास अब मौका भी है। पिछले हफ्ते उन्होंने विधानसभा सत्र के दौरान सदन में कहा भी कि कांग्रेस लीडरशिप को यूपी की जनता को बताना होगा कि यूपी के एक गुनहगार को किस वजह से अपनी पंजाब की सरकार के जरिए संरक्षण दिलवाए हुए हैं? यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी कहा है कि पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाना हमारी ड्यूटी है लेकिन अगर मुख्तार अंसारी को एक राज्य सरकार बिना किसी वजह के अपने यहां रोककर रख लेगी तो न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पहुंचेगी। पंजाब सरकार की दिलचस्पी क्यों? पंजाब में कांग्रेस सरकार है, मुख्तार अंसारी का कांग्रेस से कभी कोई राजनीतिक रिश्ता नहीं रहा है। वह बीएसपी के विधायक हैं, बावजूद इसके मुख्तार अंसारी के लिए पंजाब सरकार का सुप्रीम कोर्ट तक आना राजनीतिक गलियारों में सवाल तो खड़ा ही कर रहा है। पंजाब सरकार का कहना है कि इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। कानूनी प्रक्रिया का पालन हो रहा है, हम किसी सरकार के राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने के लिए कानूनी प्रक्रिया को नजरअंदाज नहीं कर सकते। अब मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है तो उसके फैसले का इंतजार कीजिए। पंजाब सरकार के तर्क से हटकर राजनीतिक गलियारों में मुख्तार अंसारी के पंजाब सरकार के कुछ प्रभावशाली लोगों से अच्छे संबंध होने की बात भी कही जाती है। वैसे अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई चार मार्च को है।


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