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कानपुर: पुलिस वालों को ढूंढ-ढूंढकर मारी गोली

उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुए पुलिसवालों पर हमले के मामले में पूरे देश को हिला दिया है। चौबेपुर में 8 पुलिसवालों की हत्या की कहानी जितनी खौफनाक है, उतनी ही वो शातिर अपराधी और गांव में उसके असर को भी बताती हैं। सूत्रों के अनुसार, गांव में रात में अंधेरा था। पुलिसकर्मियों के पास सर्चलाइट थी। इधर से पुलिस एकाध फायर करती और सर्चलाइट दिखाती, उससे ज्यादा तीव्रता से अपराधी फायर करते। ऑटोमैटिक हथियारों से अपराधी फायर कर रहे थे और पुलिस बचने को इधर उधर भाग रही थी। कुछ पुलिसकर्मी पथराव में जख्मी हो और बचने के लिए आसपास के घरों और भूसा रखने की जगह में शरण ली। पुलिसवालों को घसीटकर मारी गोली पुलिस के कमजोर पड़ते ही अपराधी बाहर और छिपे हुए पुलिसकर्मियों को तलाशकर मारना शुरू कर दिया। उन्हें दूर तक घसीटने के बाद गोली मार दी गई। विकास के घर से 100 मीटर दूर तक बिखरे खून के धब्बे इस बात की गवाही दे रहे थे। छत से कूदे थे सीओ सूत्रों का दावा है कि डीएसपी देवेंद्र मिश्रा अपराधियों से बचने के लिए छत से कूदे। इस कवायद में वह बुरी तरह घायल हो गए। अपराधियों ने उनके पैर पर कुल्हाड़ी से वार किया फिर गोली मार दी। हालांकि कोई अधिकारी इन तथ्यों की पुष्टि नहीं कर रहा है। ग्रामीणों ने कुछ नहीं देखा पुलिस ने बिकरू गांव के कई पुरुषों को हिरासत में लिया, लेकिन विकास का खौफ ऐसा है कि कोई भी ग्रामीण कुछ बोलने को तैयार नहीं है। पूछने पर कोई बताता है कि वह खेत में तो कोई बताता है कि वह घर में सो रहा था ओर उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। पुलिस का मानना है कि बिना ग्रामीणों की मदद कोई भी अपराधी इतनी हिमाकत नहीं कर सकता है। कोई सुरक्षा उपकरण नहीं थे सूत्रों के अनुसार, तीन दशक से अपराध की दुनिया पर राज करने वाले विकास से मोर्चा लेने वाली पुलिस के पास बुलेटप्रूफ जैकेट या हेलमेट जैसा कोई उपकरण नहीं था। यही कारण है कि इतने पुलिसकर्मियों को जान से हाथ धोना पड़ा। स्टैंडर्ड ऑपरेशन प्रॉसिजर का पालन न किए जाने के मामले पर एडीजी प्रशांत कुमार ने कोई जवाब नहीं दिया।


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