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हस्तिनापुर सेंक्चुरी में फिर दिखा बारहसिंघों का झुंड

प्रेमदेव शर्मा, मेरठ उत्तर प्रदेश के मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर समेत पांच जिलों में फैली हस्तिनापुर सेंक्चुरी में बुधवार को करीब 150 बारहसिंघों का झुंड दिखा। मुजफ्फरनगर जिले के हैदरपुर वेटलैंड के घास के मैदान में इन्हें देखा गया। अभ्यारण्य के बारहसिंघों को सबसे ज्यादा नुकसान साल 2013 के उत्तराखंड आपदा से हुआ था। उस वक्त जल प्रलय के कारण ये बह गए थे। उसके बाद से पहली बार बारहसिंघे इतनी बड़ी संख्या में दिखाई दिए। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अब ड्रोन से इस क्षेत्र में बारहसिंघों का सर्वे किया जाएगा। मुख्य वन संरक्षक एनके जानू ने कहा कि का गठन मुख्य रूप से बारहसिंघों के संरक्षण के लिए किया गया है। इनकी संख्या बढ़ना हमारे लिए अच्छी खबर है। दिख रहे हैं डॉल्फिन, अजगर और मगरमच्छ बिजनौर जिले का गंगा खादर क्षेत्र हस्तिनापुर सेंक्चुरी में शामिल है। साल 2013 की उत्तराखंड आपदा में कई बारहसिंघे गंगा की बाढ़ में बह गए थे। कुछ दिनों पहले गंगा खादर क्षेत्र में बारहसिंघा के झुंड दिखाई दिए थे। इससे पहले लॉकडाउन के दौरान सोशल मीडिया पर गंगा नदी में अठखेलियां करने वाली डॉलफिन की फोटो काफी वायरल हुई थी। इसके बाद कई-कई महीने सोए रहने वाले अजगर भी बिलों से बाहर निकलकर इधर उधर घूमते नजर आए। पिछले हफ्ते बुधवार को हस्तिनापुर में कई मगरमच्छ नदी के किनारे धूप सेंकते और मौसम का आनंद लेते नजर आए थे। हालांकि, मगरमच्छ को गंगा किनारे देखकर लोगों में डर रहता है लेकिन वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि ये पर्यावरण के लिए अच्छा संकेत है। दुर्लभ कछुओं का जन्म हस्तिनापुर सैंक्चुरी क्षेत्र स्थित हैचरी में 84 कछुओं का जन्म हुआ है। पिछले साल जनवरी में इस हैचरी का निर्माण किया गया था, जिसमें ग्रामीणों की मदद से कछुओं के 108 अंडे संरक्षित किए गए थे। इनमें से 84 कछुओं का जन्म हुआ है। इनमें कुछ दुर्लभ प्रजाति के कछुए भी शामिल हैं। वन संरक्षक वीके जैन बताते हैं कि जनवरी-19 में हंसावला में कछुआ संरक्षण कार्यक्रम के तहत गंगा के किनारे कछुआ हैचरी का निर्माण किया गया था। डीएएफओ अदिति शर्मा ने बताया कि मेरठ के हस्तिनापुर वन्य-जीव विहार में कछुआ नर्सरी तालाब का निर्माण कराया गया है। बाढ़ के बाद नर्सरी तालाब से कछुए के बच्चों को नदी में उनके सुरक्षित वास स्थल पर छोड़ दिया जाता है। साल 2019 तक इस परियोजना के तहत संकटग्रस्त प्रजातियों के 2947 बच्चों को गंगा नदी में छोड़ा जा चुका है।


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